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श्वर सब में है। मैं जो कुछ भी करता हूं उस सबको ईश्वर देखते हैं, जो ऐसा अनुभव करता है उसको कभी पाप नहीं लगता। उसका प्रत्येक व्यवहार उचित है और यही तो भक्ति है। जिसके व्यवहार में दंभ है, अभिमान है, कपट है, उसका व्यवहार शुद्ध नहीं जिसका व्यवहार शुद्ध नहीं उसे भक्ति में आनंद आता नहीं।