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भारत के हरियाणा से सरहद पार गए कलाकारों को वहां दोयम दर्जे का नागरिक समझा गया, उनकी बोली भाषा को कोई सम्मान वहां नहीं मिल पाया, यहां तक कि भारत से युद्ध के अवसरों पर उनसे जबरन वहां के कौमी तराने लिखवाए गए और गवाए गए. एक रागनी में बंदे मीर महमी ने कहा भी है कि.. गांवता बजाता चाल्या शहर के बाजार के म्हां बंदे मीर राग ना छिपता रह गुरु धनपत सिंह तै झिपता अड़ै विपता म्हं आए चले ना लोग समझदार मिले सांग की कदर थी... जिले रोहतक और हिसार के म्हां